Excellent Hair Fall Treatment
Search: Look for:   Last 1 Month   Last 6 Months   All time

भारत के मन का सांस्कृतिक सृजन है दीपपर्व

New delhi, Sat, 29 Oct 2016 NI Wire

प्रकृति में अनेक रूप, रंग, रस और नाद हैं। प्रकृति सदा से है। यह अनेक आयामों में प्रकट होती है। जान पड़ता है कि बारंबार प्रकट होने के बावजूद इसका मन नहीं भरा। अरबों-खरबों मनुष्य आए, गए, लेकिन नवजात शिशुओं का शुभागमन जारी है।

कीट, पतंग, वनस्पति का भी आवागमन ऐसा ही है। नक्षत्र उगते हैं, नष्ट होते हैं, फिर-फिर उगते हैं। प्रकृति स्वयं को प्रकट करती है बारंबार। असंख्य रूप, रस रंग के असंख्य आयाम। गुण धर्म की भिन्नता। प्रश्न उठता है कि प्रकृति का सर्वोत्तम प्रकट रूप क्या हो सकता है?

आखिरकार कोई रूप, रस, या नाद तो होगा ही। छांदोग्य उपनिषद् के ऋषि ने बताया है, "प्रकृति का समस्त सर्वोत्तम प्रकाश रूपा है।" मनुष्य को उत्तम प्रतिभा कहा जाता है। प्रति-भा प्रकाश इकाई है। आभा और प्रभा भी प्रकाशवाची हैं। जहां जहां खिलता है प्रकृति का सर्वोत्तम, वहां वहां प्रकाश। हम धन्य हो जाते हैं प्रकाश देखकर। प्रकाश दीप्ति एक विशेष अनुभूति देती है हमारे भीतर। अर्जुन ने विराट रूप देखा। उसके मुख से निकला- 'दिव्य सूर्य सहस्त्राणि।' हजारों सूर्य की दीप्ति एक साथ।

भारतीय अनुभूति का विराट प्रकाशरूपा ही है। पूर्वजों ने प्रकाश दीप्ति अनुभूति को दिव्यता कहा। सूर्य प्रकाश में वही दिवस है। इसी की अंत: अनुभूति दिव्यता या डिवाइनटी है। इसलिए जहां जहां दिव्यता वहां वहां देवता। हम भारतीय सनातन काल से बहुदेववादी हैं। क्यों न हों? हमने जहां-जहां प्रकाश पाया, वहां वहां देव पाया और माथा टेका।

सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। सूर्य नमनीय हैं। वे सहस्त्र आयामी प्रकाश रूपा हैं। ऋग्वैदिक पूर्वजों ने सूर्य को स्थावर जंगम की आत्मा गाया। चंद्र किरणें मोहित करती हंै। चंद्र प्रकाश सूर्य प्रकाश का अनुषंगी है, लेकिन सूर्य का प्रकाश भी संभवत: किसी अन्य विराट प्रकाश के स्रोत से आता है।

प्रश्न है कि कहां से आता है यह प्रकाश? प्रकाश का यह स्रोत अजर अमर जान पड़ता है। कठोपनिषद्, मुंडकोपनिषद् व श्वेताश्वतर उपनिषद् में एक साथ आए एक मंत्र में उसी स्रोत का संकेत है, 'न तत्र सूर्यो भाति, न चंद्रतारकम। नेमा विद्युत भांति कुतोयमग्नि- उस विराट प्रकाश केंद्र पर सूर्य नहीं चमकता और न ही चंद्र तारागण। वहां विद्युत और अग्नि की दीप्ति भी नहीं है।"

आगे बताते हैं, "तमे भांतमनुभाति र्सव, तस्य भासा सर्व इदं विभाति - उसी एक प्रकाश से ये सब प्रकाशित होते हैं। अष्टावक्र ने जनक की सभा में उसे 'ज्योर्तिएकं' - एक ज्योति कहा था।

अंधकार प्रकाश का अभाव ही नहीं है। अंधकार का भी अपना अस्तित्व है। ऋग्वेद के ऋषियों ने रात्रि-अंधकार को अनुभव किया था। बताते हैं, "रात्रि ने गांव वन, उपवन और धरती को अंधकार से भर दिया है।" रात्रि रम्य है। दिवस श्रम है, रात्रि विश्रम। दिवस बर्हिमुखी यात्रा है- स्वयं से दूर की ओर गतिशील। रात्रि दूर से स्वयं की ओर लौटना है। रात्रि आश्वस्ति है। रात्रि का संदेश है- 'अब स्वयं को स्वयं के भीतर ले जाओ, बाहर नहीं अन्तर्जगत में। अपने ही आत्म में करो विश्राम।'

दिन भर कर्म। कर्मशीलता में थके, टूटे, क्लांत चित्त को विश्राम की प्रशांत मुहूर्त देती है रात्रि। तमस हमारे जीवन का भाग है। कोई विकार या विकृति नहीं। इसीलिए हर माह एक रात गहन तमस के हिस्से। अमावस्या हर माह आती है। यही बताने कि तमस भी संसार सत्य का अंग है।

रात्रि को प्रकाशहीन कहा जाता है पर ऐसा है नहीं। रात्रि में चंद्रप्रकाश होता है। क्रमश: घटता बढ़ता हुआ। अमावस्या अंधकार से परिपूर्ण रात्रि है। जान पड़ता है कि अमावस ही चंद्रमा की अवकाश रात्रि है। अमावस का अंधकार उस रात प्रकाश का अभाव मात्र नहीं होता। अमावस की रात्रि में अंधकार होता है अस्तित्व रूप में।

उस रात की आकाश गंगा खिलते और दीप्ति वर्षाते हुए बहती है। तारे और नक्षत्र अपनी पूरी ऊर्जा में प्रकाश देने का प्रयास करते हैं। जैसे अमावस अपने तमस से भर देती है जीवन को वैसे ही पूर्णिमा भी। लेकिन तमस और प्रकाश की यह अनुभूति प्रतिदिन भी उपस्थित होती है।

सूर्योदय से सूर्यास्त तक का काल प्रकाशपूर्ण रहता है और सूर्यास्त से सूर्योदय उषाकाल तक तमस प्रभाव। तमस और दिवस प्रतिपल भी घटते हैं जीवन में। आलस्य, प्रमाद, निष्क्रियता, निराशा और हताशा के क्षण तमस काल हैं। सक्रियता, उत्साह और उल्लास के क्षण प्रकाश प्रेरणा हैं।

तमस और प्रकाश साथ-साथ नहीं रहते। एक आता है, दूसरा विदा हो जाता है। प्रकाश ज्ञानवाचक है और तमस अज्ञान का। ज्ञान और मूर्खता भी एक साथ रह सकते। प्रकाश देखने का माध्यम है। सत्व, रज और तम प्रकृति के गुण हैं। तीनों परस्पर खेलते हैं। बड़ा दिलचस्प है गुणों का यह खेल। कपिल ने ठीक बताया था कि गुण ही गुणों के साथ खेल करते हैं। कृष्ण ने इसमें जोड़ा कि 'जो गुणों का यह खेल देखते हुए अनासक्त हो जाता है। हे अर्जुन वही सच्चा योगी है।'

यहां देखने पर जोर है। प्रकाश हमारी सनातन आकांक्षा है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की अभीप्सा में तमस यथास्थिति है और ज्योति हमारी आकांक्षा।

पूर्णिमा परिपूर्ण चंद्र आभा है। शरद् पूर्णिमा का कहना ही क्या? इस रात चंद्र किरणें धरती तक उतरती हैं अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ। वैदिक ऋषि इसी तरह की सौ पूर्णिमा देखना चाहते थे। जैसे शरद चंद्र अपनी पूरी आभा और प्रभा में खिलता है, स्थावर जंगम पर अमृत रस बरसाता है वैसे ही शरद पूनो के ठीक 15 दिन बाद की अमावस्या अपने समूचे सघन तमस के साथ गहन अंधकार लाती है।

पूर्वजों ने इसी अमावस्या को दीपोत्सव बनाया। भारत प्रकाश प्रिय राष्ट्रीयता है। भा प्रकाश है और रत संलग्नता। पूर्वजों ने मधुमय वातायन की इस अमावस को भी झकाझक प्रकाश से भर दिया। शरद् पूर्णिमा की रात रस, गंध, दीप्ति, प्रीति, मधु, ऋत और मधुआनंद तो 15 दिन बाद झमाझम दीपमालिका। जहां जहां तमस वहां वहां प्रकाश-दीप।

सूर्य और शरद चंद्र का प्रकाश प्रकृति की अनुकंपा है तो दीपोत्सव मनुष्य की कर्मशक्ति का रचा गढ़ा तेजोमय प्रकाश है। कार्तिकी अमावस का अंधकार प्रकाश की अनुपस्थिति ही नहीं होता। यह अस्तित्वगत होता है, अनुभूति प्रगाढ़ हो तो पकड़ में आता है। गजब के द्रष्टा थे हमारे पूर्वज।

उन्होंने इसी रात्रि को अवनि अंबर दीपोत्सव सजाए। भारत इस रात केवल भूगोल नहीं होता, हिंदू-मुसलमान का संधि विच्छेद नहीं होता। यह राज्यों का संघ नहीं होता, इस या उस राजनैतिक दल द्वारा शासित भूखंड नहीं होता।

भारत इस रात 'दिव्य दीपशिखा' हो जाता है। परिपूर्ण उत्सवधर्मा। वातायन में शीत और ताप का प्रेम प्रसंग चलता है। घर, आंगन, तुलसी के चैबारे, गरीब किसान के दुवारे, खेत खलिहान, नगर, गांव, मकान, दुकान, ऊपर-नीचे सब तरफ दीप शिखा। आनंदी अचंभा है यह। अमावस की रात प्रकाश पर्व की मुहूर्त घोषित करना। प्रत्यक्ष रूप में शरद् पूनों को ही प्रकाश पर्व जानना चाहिए था।

पूर्वजों ने शरद् पूर्णिमा के प्रकाश की स्तुतियां की हैं, लेकिन तब 'तमसो मा ज्योतिर्गम' की प्यास को कर्मतप में बदलने के आह्वान का क्या होता? अमावस का गहन अंधकार प्राकृतिक है। भारत के लोग प्रकृति की अनुकंपा इस अमावस को प्रकाश से भरने की सांस्कृतिक कार्रवाई करते हैं। यह तमस आच्छादित लोकमन के भीतर और बाहर मधुर प्रकाश भरने का उत्सव।

दीप बड़ा प्यारा प्रतीक है। नन्हीं सी काया वाला मिट्टी का दीप। रूई की बाती। दीप के भीतर थोड़ा सा स्नेह। घी या तेल। प्रकाश उग जाता है। ऐसे नन्हें दीप से क्या अमावस की गहन रात प्रकाशमय हो सकती है? लेकिन दीपपर्व में एक नहीं अनेक दीप उगते हैं। एक ही घर में अनेक। सबके सब नि:स्वार्थी। वे तमस् से टकराते हैं। प्रकाश दीप्ति फैलाते हैं।

दीप प्रज्जवलन हमारी प्रकाश प्रीति का अनुष्ठान है। सो हरेक मंगल मुहूर्त में सूर्य प्रकाश के बावजूद दीप प्रज्जवलन, नीराजन और अर्चन की परंपरा है। दीपपर्व सांस्कृतिक सृजन है भारतीय जनगणमन का। (आईएएनएस/आईपीएन)


LATEST IMAGES
King of Bhutan, the Bhutan Queen and Crown Prince meeting the PM Modi
PM Narendra Modi welcomes the King of Bhutan
PM Modi paying tributes at the portrait of Sardar Vallabhbhai Patel
People take part in the Run For Unity on the Rashtriya Ekta Diwas
PM Modi flagging off the Run For Unity on the Rashtriya Ekta Diwas
Post comments:
Your Name (*) :
Your Email :
Your Phone :
Your Comment (*):
  Reload Image
 
 

Comments:


 

OTHER TOP STORIES


Excellent Hair Fall Treatment
Careers | Privacy Policy | Feedback | About Us | Contact Us | | Latest News
Copyright © 2015 NEWS TRACK India All rights reserved.